हिन्दी की यात्रा
संस्कृत से आज तक — तीन सहस्र से अधिक वर्षों की कहानी
जन्म — वैदिक संस्कृत से हिन्दी तक
लगभग 1500 ईसा-पूर्व — 1000 ईस्वी
हिन्दी का मूल संस्कृत में है। लगभग साढ़े तीन सहस्र वर्ष पहले वैदिक संस्कृत बोली और गाई जाती थी। समय के साथ बोलचाल की भाषा बदलती गई, और प्राकृत नाम की सरल बोलियाँ जन्मीं।
प्राकृत से आगे अपभ्रंश का काल आया, जिसमें संत कवियों ने रचनाएँ कीं। लगभग एक सहस्र वर्ष पहले इसी अपभ्रंश से हिन्दी — आरंभिक रूप में "हिन्दवी" — जन्मी।
मध्यकाल — दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल
लगभग तेरहवीं — उन्नीसवीं शताब्दी
तेरहवीं शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक, लगभग सात सौ वर्षों तक, फ़ारसी दिल्ली की राजसभा और प्रशासन की भाषा रही। इस लंबे संपर्क से बाज़ार, दफ़्तर, कुर्सी, किताब जैसे अनेक फ़ारसी और अरबी शब्द हमारी बोलचाल का भाग बन गए।
इसी काल में एक ओर खड़ी बोली पर फ़ारसी प्रभाव से उर्दू का जन्म हुआ, तो दूसरी ओर कबीर, तुलसीदास और सूरदास जैसे भक्ति कवियों ने संस्कृत-मूलक शब्दों से भरपूर काव्य रचकर जनभाषा को जीवित रखा।
औपनिवेशिक काल — अंग्रेज़ी शासन और भाषा-नवजागरण
लगभग 1757 — 1947
अठारहवीं शताब्दी के मध्य से भारत पर अंग्रेज़ी शासन आरंभ हुआ। प्रशासन, शिक्षा और न्याय व्यवस्था में अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग बढ़ा, और स्कूल, ऑफ़िस, टाइम, टिकट जैसे अंग्रेज़ी शब्द हमारी बोलचाल में घुल गए।
इसी काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन लेखकों ने आधुनिक हिन्दी गद्य का आधार रखा, और सायास संस्कृत की ओर लौटकर हिन्दी को उसका मूल स्वरूप लौटाने का प्रयास किया। हिन्दी और देवनागरी को राजभाषा के रूप में मान्यता दिलाने का यह आंदोलन बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक चला।
स्वतंत्रता के बाद — राजभाषा और वैश्वीकरण
1950 — आज
1950 में भारत के संविधान ने हिन्दी और देवनागरी लिपि को संघ की राजभाषा घोषित किया। प्रशासनिक और वैज्ञानिक शब्दावली को संस्कृत के आधार पर गढ़ने के प्रयास हुए — जैसे टेलीफ़ोन के लिए "दूरभाष" और स्टेशन के लिए "स्थानक"।
परंतु उसी समय वैश्वीकरण, अंग्रेज़ी-माध्यम शिक्षा और चलचित्रों के प्रभाव से बोलचाल की हिन्दी में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग और भी बढ़ता गया। आज की हिन्दी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेज़ी — सभी की परतें एक साथ विद्यमान हैं।
आज और आगे — वाक्यम् का उद्देश्य
यह कोई नई बात नहीं कि हिन्दी में अनेक भाषाओं के शब्द घुले हैं — यही तो किसी भी जीवित भाषा की पहचान है। परंतु इस मिश्रण में संस्कृत-मूलक शब्दों का वह विशाल भंडार प्रायः लुप्त हो जाता है, जो हमारी अपनी धरोहर है।
वाक्यम् किसी को दोष नहीं देता, और न किसी बोली को अशुद्ध ठहराता है। यह केवल इतना स्मरण कराना चाहता है कि "विद्यालय", "दूरभाष", "प्रतिदिन" जैसे सैकड़ों शब्द पहले से हमारी अपनी भाषा में विद्यमान हैं, अपनाए जाने की प्रतीक्षा में। अगली पीढ़ी उन्हें तभी पाएगी, जब आज हम उन्हें बोलेंगे।